बॉलीवुड की सबसे अच्छी कॉमेडी फिल्म कौनसी हैं?
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आज बात करेंगे ऐसी 9 बॉलीवुड कॉमेडी फिल्मों के बारे में, जिनके बारे में ज़्यादा लोगों ने नहीं सुना होगा।
1. रघु रोमियो (2003) - अपनी माँ के साथ-साथ रघु भी टीवी पर सास-बहू वाले नाटक देखने लगता है। एक नाटक की संस्कारी नायिका "नीता जी" से वह अत्यधिक प्रभावित हो जाता है। एक रेस्त्रां-बार की डांसर रघु को पसंद करती है। असल ज़िंदगी में "नीता जी" का कुछ लोगों से पंगा चल रहा है। इन सब लोगों के टकराने पर जो हँसी का फुहारा छूटता है, मज़ा आ जाएगा।
रघु रोमियो अभिनेता-निर्देशक रजत कपूर की निर्देशित की हुई पहली फिल्म थी। इसे 'सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्म' के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो आज तक भी किसी कॉमेडी फिल्म के लिए एक दुर्लभ बात है।
विजय राज़ एवं सुरेखा सीकरी का उत्कृष्ट अभिनय और इसकी अजीबोग़रीब कहानी इस फिल्म की मुख्य खूबियों में से हैं, तो रजत कपूर का (भारतीय सिनेमा के लिहाज़ से) अलग सा निर्देशन और पटकथा इसे हिंदी सिनेमा की एक अद्वितीय कलाकृति बनाते हैं।
ज़्यादा समझदार लोग इस फिल्म को ना देखें। इस फिल्म के लिए आपके अंदर थोड़ी पागलपंती ज़रूरी है। आप इसे इस यूट्यूब लिंक[1]पर देख सकते हैं।
2. क़रीब क़रीब सिंगल (2017) - एक आदमी अपनी नई गर्लफ्रैंड के साथ पुरानी गर्ल-फ्रैंडस से मिलने जाता है।
जहाँ इरफ़ान खान मक़बूल, हासिल और "लाइफ ऑफ़ पाई" जैसी फिल्मों में अपने दमदार अभिनय की वजह से भारत के श्रेष्ठ अभिनेताओं में शुमार होते हैं, तो वहीं हिंदी मीडियम और लाइफ इन ए मैट्रो जैसी फिल्मों में इनके विशिष्ट हास्य अंदाज़ ने आम दर्शकों को इनका प्रशंसक बना दिया है। क़रीब क़रीब सिंगल में इनका वह मज़ेदार अंदाज़ नई ऊँचाइयों को छूता है। अभिनेत्री पार्वती मैनन ने भी इनका बखूबी साथ निभाया है। फिल्म का निर्देशन अच्छा है, और छायांकन लाजवाब है।
3. मिथ्या (2008) - एक छोटे-मोटे सह-कलाकार की शक्ल एक अंडरवर्ल्ड डॉन से मिलती है। किसी ने सोचा कि इस आदमी को पकड़कर इसके हमशक्ल होने का फायदा उठाया जाए।
यह हिंदी सिनेमा की गिनी-चुनी डार्क कॉमेडी में से एक है। डार्क कॉमेडी का अर्थ होता है कि किसी बंदे की ऐसी-तैसी होती है, और हमें हँसी आती है :D
हँसी के साथ-साथ इसकी पेचीदा कहानी भी आपको बाँधे हुए रखेगी। रणवीर शौरी का अभिनय हमेशा की तरह क़ाबिले-तारीफ है। रजत कपूर टीम की तरफ से आपको एक और तोहफा।
4. भेजा फ्राई (2007) - भारत-भूषण एक आकांक्षी गायक है, लेकिन बहुत ही बेसुरा। ऐसे ही लोगों को म्यूज़िक प्रोडूसर रंजीत और उसके दोस्त मज़ाक उड़ाने के लिए हर शुक्रवार बुलाया करते हैं। लेकिन इस बार कौन किसका मज़ाक उड़ाएगा - यह देखने वाली बात है।
विनय पाठक की यह भूमिका भारतीय सिनेमा की सबसे बेहतरीन भूमिकाओं में से एक है, और फिल्म की कहानी तो माशाल्लाह। भगदड़ और ग़लतफहमी वाली कॉमेडी से हटकर यह अलग शानदार कॉमेडी आपको जरूर देखनी चाहिए।
अगर यह फिल्म अच्छी लगे, तब भी इसका औसतन सीक्वल भेजा फ्राई 2 देखने की भूल ना करें।
5. मुंबई मैटिनी (2003) - एक युवक जो अभी तक अपने वर्जिन होने से परेशान है। एक बी-ग्रेड फिल्मकार जो कंगाल है। एक ढकोसलेबाज़ बाबा। जो रायता फैलेगा, उसे सँभालेगा कौन?
राहुल बोस, सौरभ शुक्ला, विजय राज़, असराणी और मेरी पसंदीदा पेरिज़ाद ज़ोरोबियन अभिनीत यह फिल्म आपको खूब गुदगुदाएगी। ध्यान रहे कि यह परिवार के साथ देखने के बजाए अपने दोस्तों के साथ देखने वाली फिल्म है।
6. बॉम्बे बॉयज़ (1998) - विदेशों में पले-बढ़े तीन भारतीय मूल के युवक मुंबई आए हैं। अलग-अलग चीज़ों की तलाश में - बॉलीवुड करियर, एक संगीतकार की अपनी जड़ों की तलाश, और एक का बिछड़ा हुआ भाई।
मुंबई के वेश्यालय, ड्रग्स, शराबखाने (बार), बस्ती, अंडरवर्ल्ड डॉन, को लेकर बनी हुई 'मुंबई नॉयर' की थ्रिलर फिल्में आपने देखी होंगी, लेकिन निर्देशक कैज़ाद गुस्ताद ने इस परिवेश में यह कॉमेडी फिल्म बनाई है। कपिल शर्मा वाली मज़ाकिया डॉयलोग (पंच) मारने वाली वाली कॉमेडी आपको यहाँ नहीं मिलेगी। यह एक पॉप कल्चर टाइप की बिंदास फिल्म है।
नसीरुद्दीन शाह, राहुल बोस, नवीन एंड्रयूज़, तारा देशपांडे मुख्य भूमिकाओं में हैं। चालीस साल से ज़्यादा उम्र वाले यह फिल्म देखने से बचें।
7. खोसला का घोसला (2006) - एक मिडिल क्लास के आदमी का पूरी ज़िंदगी की कमाई से लिया हुआ प्लॉट किसी बदमाश ने हड़प लिया है। उसका बेटा, बेटे की गर्लफ्रैंड और उनके दोस्त प्लाट वापस लेने के लिए अलग ही तिकड़म चलाएँगे।
अपनी पहली फिल्म से ही दिबाकर बनर्जी ने इंडस्ट्री में अपना सिक्का जमा दिया। मिडिल क्लास परिवार की बारीकियों और बोमन ईरानी, अनुपम खेर, प्रवीण डबास, तारा शर्मा के अभिनय से सजी हुई एक मासूमियत भरी जबरदस्त कॉमेडी। अगर आपने नहीं देखी है, तो जल्द ही अपने परिवार के साथ इसका मज़ा उठाएँ।
8. जाने भी दो यारों (1983) - कॉमेडी के द्वारा देश की समस्याओं पर कटाक्ष करने की परंपरा बहुत पुरानी है। फ्लॉप शो और ऑफिस-ऑफिस तो भारत में बहुत लोकप्रिय रहे ही हैं। अब देखिए कुंदन शाह निर्देशित यह फिल्म, जो देश में फैले भ्रष्टाचार, पुलिस और मीडिया पर चुटकी लेती है।
उस वक़्त देश की समस्याओं को उजागर करना आपको देशद्रोही नहीं बनाता था, बल्कि कमाल की बात यह है कि सरकारी विभाग एन.एफ.डी.सी. ने खुद ऐसी आलोचनात्मक फिल्म बनाने के लिए पैसा लगाया। इसे 'सर्वश्रेष्ठ पहली फिल्म' का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी प्रदान किया गया।
अभिनय की बात करें, तो यह फिल्म टैलेंट का पावरहाउस है। नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, पंकज कपूर, भक्ति बर्वे जैसे दिग्गजों को इकट्ठे एक फिल्म में देखने का यह गुदगुदाता अवसर हाथ से मत जाने दें।
9. शतरंज के खिलाड़ी (1977) - वर्ष 1856 में अंग्रेज़ अवध (लखनऊ) पर कब्ज़ा करने वाले हैं। नवाब वाजिद अली शाह के पात्र को देखकर आपको राहुल गाँधी की याद आना लाज़मी है। आदमी तो सही है, लेकिन गलत जगह फँसा हुआ है। फिर शतरंज के शौक़ीन दो रईसज़ादे हैं, आपके-हमारे जैसे, जिन्हें गप्पें मारने और शतरंज खेलने से फुर्सत नहीं।
सत्यजीत रे हिंदी में फिल्म बनाने के बहुत से ऑफर ठुकरा चुके थे। आखिरकार 1977 में प्रोडूसर सुरेश जिंदल उन्हें इसके लिए मनाने में कामयाब रहे। इस खबर से बॉलीवुड हस्तियों का तांता लग गया।
शबाना आज़मी को एक छोटा सा रोल मिल सका, जिसे उन्होंने बेहद खुशी से स्वीकार किया।[4]अमिताभ बच्चन को रोल तो नहीं मिला, लेकिन सूत्रधार के लिए उनकी आवाज़ को चुन लिया गया। शोले फिल्म से सुपरस्टार बन चुके अमजद खान और संजीव कुमार को इसमें मुख्य भूमिकाएँ निभाने का सुअवसर मिला। साथ में सईद जाफरी, ब्रिटिश निर्देशक रिचर्ड एटेनबरो और इस फिल्म से अपने धमाकेदार करियर की शुरुआत कर रहे विक्टर बनर्जी।
यह फिल्म मुंशी प्रेमचंद की कहानी पर आधारित थी, जिसे सत्यजीत रे कुछ वक़्त पहले ही पढ़ा था। इस राजनैतिक व्यंग वाली फिल्म का छायांकन और संकलन सत्यजीत रे के वर्षों से सहयोगी रहे क्रमशः सौमेंदु रॉय और दलाल दत्ता ने ही किया। यह उनकी सबसे महँगी फिल्म थी। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कमाल नहीं कर पाई, लेकिन 'फिल्मफेयर क्रिटिक अवार्ड' और 'सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्म' के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से नवाज़ी गई। सौमेंदु रॉय ने इसके अद्भुत छायांकन के लिए अपने करियर का तीसरा राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार हासिल किया।
फिल्म-प्रेमियों के बीच अब यह एक कल्ट फिल्म का दर्ज़ा हासिल कर चुकी है। "ये सब क्या मज़ाक चल रहा है यार" किस्म की कॉमेडी वाली इस उम्दा फिल्म को जरूर देखें, अगर आपको कुछ नया देखने से परहेज़ नहीं है। यह फिल्म मुफ्त में देखने के लिए हॉटस्टार पर उपलब्ध है। फिल्म का लिंक[5]नीचे फुटनोट में है।
आखिर में जल्दी से बहुचर्चित कॉमेडी फिल्मों का भी ज़िक्र कर लिया जाए -
मुन्नाभाई एम.बी.बी.एस., हेरा फेरी, अंदाज़ अपना अपना, चाची 420, रन (विजय राज़ वाला हिस्सा), प्यार के साइड इफेक्ट्स, वैलकम, विक्की डोनर, बरेली की बर्फी, तनु वैड्स मनु (भाग 1, भाग 2), हंगामा, हलचल, लगे रहो मुन्नाभाई, पीके, ओह माय गॉड, बादशाह, डुप्लीकेट, मालामाल वीकली, चुपके चुपके (पुरानी), अंगूर, पड़ोसन, गोलमाल (पुरानी), गोलमाल फन अनलिमिटेड (पहला भाग), धमाल, फुकरे, स्टाइल, एक्सक्यूज़ मी, दूल्हे राजा, थ्री इडियट्स, पीपली लाइव, नो एंट्री, चलती का नाम गाड़ी, हाफ टिकट, चश्मे-बद्दूर, हीरो नंबर 1, इश्क़, सिंह इज़ किंग।
आपकी पसंदीदा कॉमेडी फिल्म कौनसी है? इन दुर्लभ कॉमेडी फिल्मों में से आपने कौनसी फिल्में देखी हुई हैं?
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